लोकसभा परिसीमन विवाद तेज जनसंख्या vs आर्थिक आधार पर देशभर में बहस

लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर देश में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। संविधान के अनुसार परिसीमन का आधार मुख्य रूप से जनसंख्या माना गया है। अनुच्छेद 81 और 82 में स्पष्ट प्रावधान है कि संसद में सीटों का वितरण जनसंख्या के आधार पर और प्रत्येक जनगणना के बाद होना चाहिए। इसी कारण अधिकांश विधि विशेषज्ञ मानते हैं कि जनसंख्या ही सबसे वैध और संवैधानिक आधार है। उनका कहना है कि संविधान की मूल भावना हर नागरिक के वोट को समान महत्व देने की है और उसी आधार पर प्रतिनिधित्व तय होना चाहिए।
1976 के बाद जमी हुई व्यवस्था, परिसीमन पर लंबे समय से रोक
विशेषज्ञों के अनुसार 1976 के बाद परिसीमन प्रक्रिया को स्थगित कर दिया गया था जिसके कारण लोकसभा सीटों की संरचना लंबे समय से स्थिर है। कई पूर्व न्यायाधीशों का मानना है कि यदि परिसीमन होता है तो वह केवल जनसंख्या के आधार पर ही होना चाहिए। उनका तर्क है कि हर सांसद के पीछे की जनसंख्या में बड़ा अंतर लोकतांत्रिक असंतुलन पैदा करता है। इसलिए समय-समय पर परिसीमन आवश्यक है ताकि प्रतिनिधित्व सही और संतुलित बना रहे। उनका यह भी कहना है कि अगर कोई बदलाव करना है तो वह केवल संविधान संशोधन के माध्यम से ही संभव है।

जनसंख्या बनाम विकास का नया तर्क, बदलती सोच ने बढ़ाई बहस
कुछ विधि विशेषज्ञ इस मुद्दे पर अलग राय रखते हैं। उनका मानना है कि केवल जनसंख्या ही एकमात्र आधार नहीं हो सकता। उत्तराखंड हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के अनुसार जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है उन्हें सीटों में कमी का नुकसान नहीं होना चाहिए। उनका तर्क है कि विकास और जनसंख्या नियंत्रण दोनों को ध्यान में रखकर परिसीमन होना चाहिए। वहीं सुप्रीम कोर्ट के कुछ वरिष्ठ वकीलों का सुझाव है कि आर्थिक योगदान यानी जीडीपी ग्रोथ और टैक्स योगदान को भी एक आधार माना जा सकता है।
लोकतंत्र और समान प्रतिनिधित्व पर सवाल, विशेषज्ञों में मतभेद जारी
इस बहस के बीच कई विशेषज्ञ आर्थिक आधार को पूरी तरह अस्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि अगर प्रतिनिधित्व आर्थिक योगदान पर आधारित हुआ तो लोकतंत्र का मूल सिद्धांत कमजोर हो जाएगा। सभी नागरिकों के वोट का मूल्य समान होना चाहिए चाहे वह अमीर हो या गरीब। इसी तरह शिक्षा या आर्थिक स्थिति को भी मतदान के अधिकार से नहीं जोड़ा गया है। इसलिए परिसीमन का आधार केवल जनसंख्या होना चाहिए या फिर संतुलित रूप से अन्य सामाजिक और क्षेत्रीय कारकों को भी शामिल किया जाए यह बहस अभी जारी है।